दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बचने के लिए पति उस वैवाहिक विवाद को दोबारा नहीं उठा सकता, जिस पर अदालत पहले ही अंतिम फैसला दे चुकी है।
दिल्ली हाईकोर्ट: भरण-पोषण से बचने के लिए पति पुराने वैवाहिक विवाद को दोबारा नहीं उठा सकता
दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई पति केवल भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बचने के लिए ऐसे वैवाहिक विवाद को दोबारा नहीं उठा सकता, जिसका फैसला पहले ही अदालतों द्वारा किया जा चुका है। यदि किसी सक्षम अदालत ने पति-पत्नी के वैवाहिक संबंध से जुड़े सवाल पर अंतिम निर्णय दे दिया है, तो उसी मुद्दे को बाद की कार्यवाही में फिर से चुनौती नहीं दी जा सकती।
यह टिप्पणी उस मामले में सामने आई जिसमें पति ने फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को भरण-पोषण देने के आदेश को चुनौती दी थी। पति ने फिर से यह सवाल उठाने की कोशिश की कि संबंधित महिला उसकी कानूनी पत्नी है या नहीं। हाईकोर्ट ने इस प्रयास को स्वीकार नहीं किया और पहले हो चुके मुकदमे के अंतिम निर्णय को महत्व दिया।
क्या था पूरा मामला
इस मामले में दोनों पक्षों का विवाह वर्ष 2002 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। विवाह के बाद पति ने वैवाहिक संबंध को लेकर विवाद खड़ा किया और अदालत में यह दावा किया कि वह विवाहित नहीं है।
वर्ष 2003 में पति ने अदालत का दरवाजा खटखटाकर यह घोषणा कराने की मांग की कि वह अविवाहित है। उसने यह भी चाहा कि महिला को खुद को उसकी पत्नी बताने से रोका जाए।
शुरुआत में अदालत का फैसला पति के पक्ष में आया। इसके बाद पत्नी ने उस फैसले के खिलाफ अपील की। अपीलीय अदालत ने वर्ष 2006 में पहले के फैसले को बदल दिया और वैवाहिक संबंध से जुड़ी स्थिति को पति के खिलाफ तय किया।
इसके बाद पति ने आगे भी इस फैसले को चुनौती दी। हालांकि, वर्ष 2011 में उसकी दूसरी अपील भी खारिज हो गई। इसके बाद पहले के न्यायिक निर्णय को अंतिमता प्राप्त हो गई।
पत्नी ने भरण-पोषण की मांग की
वैवाहिक विवाद के बीच पत्नी ने वर्ष 2008 में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के लिए कार्यवाही शुरू की।
फैमिली कोर्ट ने मामले पर विचार करने के बाद पति को पत्नी को अलग-अलग अवधि के लिए अलग-अलग राशि में मासिक भरण-पोषण देने का निर्देश दिया।
अदालत के आदेश के अनुसार, पत्नी को भरण-पोषण की याचिका की तारीख से दिसंबर 2011 तक हर महीने 7,000 रुपये और जनवरी 2012 से आगे हर महीने 10,000 रुपये देने का निर्देश दिया गया। इसके अलावा, पति को मुकदमे के खर्च के लिए 11,000 रुपये देने का भी आदेश दिया गया।
पति ने फिर उठाया शादी का सवाल
फैमिली कोर्ट के आदेश से असंतुष्ट होकर पति दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा। उसकी ओर से मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया कि संबंधित महिला को उसकी कानूनी पत्नी नहीं माना जा सकता।
पति ने पहले हुए मुकदमे का सहारा लेते हुए वैवाहिक संबंध पर फिर सवाल उठाने की कोशिश की। उसका कहना था कि पिछली अपीलीय कार्यवाही में मामले का सही तरीके से गुण-दोष के आधार पर फैसला नहीं हुआ था। इसलिए उसके अनुसार, भरण-पोषण की कार्यवाही में इस मुद्दे को फिर से उठाने पर रोक नहीं होनी चाहिए।
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हाईकोर्ट ने पति की दलील स्वीकार नहीं की
दिल्ली हाईकोर्ट ने पति की इस दलील को खारिज कर दिया।
न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने मामले के पुराने न्यायिक इतिहास पर गौर करते हुए कहा कि पक्षों के वैवाहिक संबंध का मुद्दा पहले ही अदालतों के सामने उठाया जा चुका था। इस विवाद पर अपीलीय स्तर पर फैसला हुआ और बाद की अपील भी खारिज हो गई।
इस स्थिति में पति को उसी मुद्दे को एक नई कार्यवाही में फिर से उठाने का अधिकार नहीं दिया जा सकता था।
एक ही विवाद को बार-बार नहीं खोला जा सकता
हाईकोर्ट ने मामले में न्यायिक फैसले की अंतिमता के सिद्धांत को महत्वपूर्ण माना। अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी विवाद पर अंतिम निर्णय हो जाने के बाद पक्षकार उसी विषय को बार-बार नई कार्यवाही के माध्यम से जीवित न करें।
यदि कोई पक्ष पहले ही किसी मुद्दे पर मुकदमा लड़ चुका है और उसके खिलाफ अंतिम फैसला आ चुका है, तो केवल इसलिए उस मुद्दे को दोबारा नहीं उठाया जा सकता क्योंकि बाद की कार्यवाही में वह उसके लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है।
इस मामले में भी पति पहले वैवाहिक संबंध के मुद्दे पर अदालतों में अपना पक्ष रख चुका था। उसकी चुनौती अंततः सफल नहीं हुई। इसलिए वह भरण-पोषण की कार्यवाही को उसी विवाद को दोबारा शुरू करने का माध्यम नहीं बना सकता था।
भरण-पोषण की कार्यवाही में क्या प्रभाव पड़ा
पत्नी की भरण-पोषण याचिका में पति द्वारा वैवाहिक संबंध को लेकर दोबारा सवाल उठाने का प्रयास इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि यदि वह महिला को पत्नी मानने से ही इनकार करता, तो वह भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर सकता था।
लेकिन हाईकोर्ट ने पहले के अंतिम निर्णय को नजरअंदाज करने की अनुमति नहीं दी। अदालत ने माना कि एक बार संबंधित मुद्दा न्यायिक प्रक्रिया में अंतिम रूप से तय हो जाने के बाद बाद की कार्यवाही में उसी आधार पर दोबारा विवाद खड़ा करना उचित नहीं है।
फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार
दिल्ली हाईकोर्ट ने पति की चुनौती को खारिज कर दिया और फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए भरण-पोषण के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
अदालत के फैसले से यह साफ हुआ कि पहले से तय वैवाहिक विवाद को केवल आर्थिक जिम्मेदारी से बचने के उद्देश्य से फिर से नहीं उठाया जा सकता।
इस फैसले का महत्व
यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण है जहां किसी वैवाहिक विवाद से जुड़ा मुद्दा पहले ही अदालत द्वारा अंतिम रूप से तय किया जा चुका हो।
अदालत का संदेश साफ है कि मुकदमेबाजी को बार-बार दोहराने का जरिया नहीं बनाया जा सकता। किसी पक्ष को एक ही मुद्दे पर अलग-अलग कार्यवाहियों में लगातार नई चुनौती देने की अनुमति देने से न्यायिक प्रक्रिया की निश्चितता प्रभावित होगी।
इस मामले में पति पहले ही विवाह से संबंधित विवाद को अदालतों के सामने उठा चुका था। अंतिम निर्णय उसके पक्ष में नहीं आने के बाद वह उसी मुद्दे को भरण-पोषण की कार्यवाही में फिर से नहीं उठा सकता था।
निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में यह महत्वपूर्ण बात दोहराई कि पहले से अंतिम रूप से तय किए जा चुके वैवाहिक विवाद को केवल भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बचने के लिए दोबारा नहीं खोला जा सकता।
यदि किसी सक्षम अदालत का फैसला अंतिम हो चुका है और उसे आगे की न्यायिक चुनौती में भी नहीं बदला गया है, तो संबंधित पक्ष उस मुद्दे को बाद की कार्यवाही में फिर से विवादित नहीं कर सकता।
यह निर्णय न्यायिक फैसलों की अंतिमता और अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के सिद्धांत को मजबूत करता है।