मां की कमाई से पिता की Child Maintenance जिम्मेदारी आधी नहीं होगी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मां की आय के आधार पर पिता की बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी अपने आप कम नहीं की जा सकती। जानिए फैसले की पूरी जानकारी।

मां की कमाई से पिता की बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी आधी नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल इसलिए पिता की जिम्मेदारी कम नहीं की जा सकती क्योंकि मां खुद कमाती है। अदालत ने कहा कि बच्चों की देखभाल और उनके खर्च का फैसला केवल माता-पिता की आय को जोड़कर या आधा-आधा बांटकर नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी माना कि बच्चों की रोजमर्रा की देखभाल, पालन-पोषण और उनकी जरूरतों को पूरा करने में मां की भूमिका का भी महत्व है। इसलिए मां की नौकरी या उसकी आय को पिता की जिम्मेदारी कम करने का स्वतः आधार नहीं बनाया जा सकता।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला एक ऐसे दंपती से जुड़ा था, जो दोनों पेशे से डॉक्टर थे। उनके दो नाबालिग बच्चे थे। वैवाहिक विवाद के बाद बच्चे मां के साथ रह रहे थे और उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी मुख्य रूप से मां संभाल रही थी।

मां ने बच्चों के लिए भरण-पोषण की मांग की थी। मामले में सामने आया कि मां की अपनी मासिक आय लगभग ₹1.5 लाख थी, जबकि पिता ने करीब ₹2 लाख की मासिक आय बताई थी। हालांकि, मां की ओर से यह दावा किया गया कि पिता की वास्तविक कमाई इससे अधिक हो सकती है।

Also Read: क्या भारत में बहुविवाह पर लगेगा बैन? सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पर्सनल लॉ को चुनौती

फैमिली कोर्ट ने कितना भरण-पोषण तय किया?

फैमिली कोर्ट ने बच्चों की शिक्षा, पालन-पोषण और दूसरी जरूरी जरूरतों को देखते हुए पिता को प्रत्येक बच्चे के लिए ₹30,000 प्रति माह देने का निर्देश दिया था।

इस तरह दोनों बच्चों के लिए कुल अंतरिम भरण-पोषण की राशि ₹60,000 प्रति माह तय की गई थी।

मां के लिए अलग से अंतरिम भरण-पोषण की मांग स्वीकार नहीं की गई थी।

हाई कोर्ट ने राशि क्यों घटाई?

पिता ने फैमिली कोर्ट के आदेश को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट ने मामले पर विचार करने के बाद बच्चों के लिए तय कुल राशि को घटाकर ₹30,000 प्रति माह कर दिया।

इस संशोधित व्यवस्था में पिता को प्रत्येक बच्चे के लिए ₹15,000 प्रति माह देने को कहा गया।

मां की अपनी आय भी इस फैसले में एक महत्वपूर्ण पहलू रही। इसके बाद मां ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करते हुए स्पष्ट किया कि मां के कमाने का मतलब यह नहीं है कि पिता की बच्चों के प्रति आर्थिक जिम्मेदारी उसी अनुपात में कम कर दी जाए।

अदालत के अनुसार, बच्चों की जरूरतों का आकलन करते समय केवल माता-पिता की सैलरी की तुलना करना सही तरीका नहीं है।

दोनों माता-पिता की आर्थिक क्षमता को देखा जा सकता है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मां की आय के कारण पिता की जिम्मेदारी अपने आप आधी हो जाएगी।

Also Read: विवाह करना मानव अधिकार, तलाक अपील में 2 महीने का स्टे जरूरी: मद्रास हाई कोर्ट

बच्चों की देखभाल भी एक महत्वपूर्ण योगदान है

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को भी महत्व दिया कि बच्चे मां के साथ रह रहे थे और उनके रोजमर्रा के पालन-पोषण की जिम्मेदारी मां निभा रही थी।

बच्चों की देखभाल केवल आर्थिक खर्च तक सीमित नहीं होती। स्कूल की जरूरतों को देखना, स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों का ध्यान रखना, घर पर बच्चों की देखभाल करना और उनकी दैनिक गतिविधियों में साथ देना भी माता-पिता के योगदान का हिस्सा है।

इन जिम्मेदारियों को सीधे रुपये में मापना आसान नहीं है। इसलिए किसी एक माता-पिता की आय को देखकर दूसरे की जिम्मेदारी कम करना उचित नहीं होगा।

बच्चों की जरूरत सबसे महत्वपूर्ण है

भरण-पोषण से जुड़े मामलों में अदालत का मुख्य ध्यान बच्चों के हित और उनकी उचित जरूरतों पर रहता है।

इन जरूरतों में कई चीजें शामिल हो सकती हैं, जैसे:

  • शिक्षा और स्कूल से जुड़े खर्च
  • भोजन और कपड़े
  • स्वास्थ्य और चिकित्सा संबंधी जरूरतें
  • रहने और दैनिक जीवन के खर्च
  • बच्चों की उम्र के अनुसार अन्य आवश्यक खर्च
  • बेहतर पालन-पोषण और विकास से जुड़े खर्च

इन सभी पहलुओं को देखते हुए अदालत यह तय करती है कि बच्चों के लिए उचित आर्थिक सहायता कितनी होनी चाहिए।

मां की नौकरी का मतलब जिम्मेदारी से छूट नहीं

इस फैसले का यह अर्थ नहीं है कि मां की आय को अदालत कभी ध्यान में नहीं रख सकती। माता-पिता की आर्थिक स्थिति भरण-पोषण तय करते समय प्रासंगिक हो सकती है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण बात सामने रखी कि मां की आय को एक तय गणितीय फार्मूले की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

उदाहरण के लिए, अगर मां कमाती है तो इसका सीधा मतलब यह नहीं हो सकता कि पिता का योगदान आधा कर दिया जाए। प्रत्येक मामले में बच्चों की वास्तविक जरूरतों, माता-पिता की आर्थिक स्थिति और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारियों को समग्र रूप से देखना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने पुरानी राशि बहाल की

मामले की परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा घटाई गई राशि को हटाते हुए फैमिली कोर्ट का आदेश बहाल कर दिया।

इसका मतलब है कि दोनों बच्चों के लिए ₹30,000-₹30,000 प्रति माह, यानी कुल ₹60,000 प्रति माह का अंतरिम भरण-पोषण फिर से लागू हो गया।

इस फैसले का महत्व क्या है?

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह संदेश मिलता है कि बच्चों के भरण-पोषण को केवल माता-पिता की कमाई का गणित बनाकर नहीं देखा जाना चाहिए।

कई परिवारों में एक माता-पिता अधिक आर्थिक योगदान देता है, जबकि दूसरा बच्चों की रोजमर्रा की देखभाल में अधिक समय और मेहनत लगाता है। दोनों तरह के योगदान बच्चों के जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

अदालत ने इसी व्यापक दृष्टिकोण पर जोर दिया है।

माता-पिता दोनों की जिम्मेदारी, लेकिन बच्चों का हित सबसे ऊपर

माता और पिता दोनों की बच्चों के प्रति जिम्मेदारी होती है। हालांकि, इस जिम्मेदारी का निर्धारण केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कौन कितना वेतन कमाता है।

बच्चों की उम्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, जीवन स्तर, दैनिक जरूरतें और दोनों माता-पिता की आर्थिक क्षमता जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है।

इसलिए किसी मामले में मां की आय मौजूद होने मात्र से पिता की जिम्मेदारी स्वतः कम नहीं हो जाती।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मुख्य बातें

  • मां के नौकरी करने से पिता की बच्चों के प्रति आर्थिक जिम्मेदारी अपने आप कम नहीं होती।
  • बच्चों के भरण-पोषण को केवल माता-पिता की आय के आधार पर आधा-आधा नहीं बांटा जा सकता।
  • बच्चों की रोजमर्रा की देखभाल भी माता-पिता के योगदान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
  • बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, रहने और अन्य जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी है।
  • माता-पिता की आर्थिक स्थिति का आकलन किया जा सकता है, लेकिन किसी एक आय को देखकर जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।
  • इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों बच्चों के लिए ₹30,000-₹30,000 प्रति माह की राशि बहाल कर दी।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बच्चों के भरण-पोषण से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। मां की कमाई को पिता की जिम्मेदारी कम करने का सीधा आधार नहीं बनाया जा सकता।

बच्चों की जरूरतें और उनका बेहतर भविष्य सबसे महत्वपूर्ण हैं। इसलिए भरण-पोषण की राशि तय करते समय अदालत को माता-पिता की आय के साथ-साथ बच्चों की वास्तविक जरूरतों और उनकी देखभाल में प्रत्येक माता-पिता की भूमिका को भी ध्यान में रखना होगा।

यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि बच्चों की परवरिश में आर्थिक सहयोग के साथ-साथ समय, देखभाल और जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण योगदान हैं।

Leave a Comment