बच्चे की कस्टडी मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, फैमिली कोर्ट को हाई कोर्ट के आदेश का पालन करने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी से जुड़े एक विवाद में बेंगलुरु की फैमिली कोर्ट के रुख पर गंभीर चिंता जताई है। मामला बच्चे के माता-पिता के बीच कस्टडी और मुलाकात के अधिकारों को लेकर था। सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट द्वारा पहले तय की गई व्यवस्था में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए पिता को उस आदेश का पालन करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि निचली अदालतों को किसी मामले में पहले से दिए गए हाई कोर्ट के आदेशों और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों को ध्यानपूर्वक देखना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित न्यायिक अधिकारी को भविष्य में ऐसे मामलों में अधिक सावधानी बरतने की सलाह दी।

बच्चे की कस्टडी मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, फैमिली कोर्ट को हाई कोर्ट के आदेश का पालन करने का निर्देश

क्या था पूरा मामला?

यह विवाद एक नाबालिग बच्ची की कस्टडी को लेकर सामने आया। बच्ची के पिता ने बेंगलुरु की फैमिली कोर्ट में कस्टडी से संबंधित याचिका दायर की थी। इसके साथ उन्होंने अंतरिम राहत की मांग भी की थी।

फैमिली कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पिता को बच्ची से मिलने और कुछ अवधि के लिए उसे अपने साथ रखने की अनुमति दी थी। आदेश के तहत पिता को निर्धारित दिनों में बच्ची से मिलने का अधिकार दिया गया था।

बाद में बच्ची की मां ने इस व्यवस्था को कर्नाटक हाई कोर्ट के सामने चुनौती दी। मां का कहना था कि परिस्थितियों में बदलाव होने के कारण पहले से तय मुलाकात की व्यवस्था में संशोधन जरूरी है।

मां के पुणे जाने के बाद बदली व्यवस्था

मां नौकरी के कारण पुणे चली गई थीं। इस बदली हुई परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट ने पहले की मुलाकात व्यवस्था में बदलाव किया।

हाई कोर्ट ने पिता को बच्ची के साथ फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से संपर्क बनाए रखने की अनुमति दी। इसके अलावा पिता को हर महीने निर्धारित अवधि के लिए बच्ची के साथ समय बिताने का अधिकार भी दिया गया।

इस व्यवस्था का उद्देश्य यह था कि बच्ची का अपने पिता के साथ संपर्क बना रहे और साथ ही उसके वर्तमान निवास तथा परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाए।

Also Read: भरण-पोषण से बचने के लिए पति पुराना विवाह विवाद नहीं उठा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला

बच्ची की कस्टडी को लेकर फिर बढ़ा विवाद

इसके बाद पिता और बच्ची के बीच एक निर्धारित मुलाकात हुई। मुलाकात के बाद बच्ची को लेकर दोनों पक्षों के बीच फिर विवाद उत्पन्न हो गया।

मां ने फैमिली कोर्ट का रुख करते हुए बच्ची की तत्काल कस्टडी वापस दिलाने की मांग की। उनका आरोप था कि बच्ची को निर्धारित व्यवस्था के विपरीत उनके पास वापस नहीं किया गया।

दूसरी ओर, पिता ने इन आरोपों से अलग अपना पक्ष रखा। उनका कहना था कि बच्ची को वह अपने परिवार के सदस्यों के पास ले गए थे और परिस्थितियों को लेकर दोनों पक्षों के बीच बातचीत हुई थी।

इस तरह दोनों माता-पिता ने बच्ची की कस्टडी को लेकर अलग-अलग दावे किए।

Also Read: मां की कमाई से पिता की Child Maintenance जिम्मेदारी आधी नहीं होगी: सुप्रीम कोर्ट

फैमिली कोर्ट के आदेश से उठा विवाद

फैमिली कोर्ट ने मां की ओर से दायर आवेदन पर सुनवाई की। अदालत ने मां द्वारा बताई गई परिस्थितियों और आवेदन दाखिल करने में हुई देरी को लेकर सवाल उठाए।

फैमिली कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि मां ने अपने पुणे चले जाने की जानकारी अदालत के समक्ष उचित तरीके से नहीं रखी थी। इन्हीं आधारों पर उनकी मांग को स्वीकार नहीं किया गया।

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट द्वारा पहले निर्धारित मुलाकात की व्यवस्था में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने पिता को निर्देश दिया कि वह हाई कोर्ट द्वारा तय किए गए विजिटेशन यानी मुलाकात के नियमों का पालन करें।

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य चिंता यह थी कि फैमिली कोर्ट की कुछ टिप्पणियां पहले से मौजूद हाई कोर्ट के आदेश और रिकॉर्ड में उपलब्ध परिस्थितियों से मेल नहीं खाती थीं।

कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि हाई कोर्ट ने मां के पुणे चले जाने की स्थिति को पहले ही ध्यान में रखते हुए मुलाकात की नई व्यवस्था तय की थी। ऐसे में निचली अदालत के लिए इस तथ्य को नजरअंदाज करना उचित नहीं था।

निचली अदालतों को हाई कोर्ट के आदेशों का सम्मान करना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति कर्नाटक हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से चीफ जस्टिस के समक्ष रखने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने संबंधित न्यायिक अधिकारी को भविष्य में मामलों की सुनवाई करते समय अधिक सावधानी बरतने की बात कही।

इस मामले से यह महत्वपूर्ण बात सामने आती है कि जब किसी मामले में हाई कोर्ट पहले ही कोई आदेश पारित कर चुका हो, तो उसके अधीन आने वाली अदालत को उस आदेश और उसमें दर्ज तथ्यों को पूरी गंभीरता से ध्यान में रखना चाहिए।

Also Read: शादी पत्नी पर नियंत्रण का अधिकार नहीं देती: कर्नाटक हाई कोर्ट

बच्चे की कस्टडी के मामलों में बच्चे का हित सबसे महत्वपूर्ण

बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामलों में अदालतों के सामने केवल माता-पिता के अधिकारों का सवाल नहीं होता। बच्चे की सुरक्षा, मानसिक स्थिति, स्थिरता और दोनों माता-पिता के साथ उसके संबंध भी महत्वपूर्ण होते हैं।

इसी वजह से कस्टडी और विजिटेशन के आदेश परिस्थितियों के अनुसार बदले भी जा सकते हैं। लेकिन जब तक किसी सक्षम अदालत द्वारा नया आदेश नहीं दिया जाता, तब तक मौजूदा न्यायिक निर्देशों का पालन करना आवश्यक होता है।

सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप का मुख्य संदेश यही है कि पारिवारिक विवादों में अदालतों को रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों और वरिष्ठ अदालतों के आदेशों को ध्यान में रखकर सावधानीपूर्वक निर्णय लेना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मुख्य संदेश

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कोई नई कस्टडी व्यवस्था लागू करने के बजाय कर्नाटक हाई कोर्ट द्वारा पहले से तय व्यवस्था को प्रभावी बनाए रखा।

पिता को हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार बच्ची से मुलाकात और संपर्क बनाए रखने को कहा गया। साथ ही, फैमिली कोर्ट की कार्यवाही को लेकर उठी चिंताओं को देखते हुए न्यायिक स्तर पर अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

यह मामला बताता है कि बच्चे की कस्टडी से जुड़े विवादों में अदालतों के आदेशों के बीच स्पष्टता और निरंतरता बेहद जरूरी है। ऐसे मामलों में हर निर्णय का केंद्र बच्चे का कल्याण होना चाहिए और सभी पक्षों को अदालत द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करना चाहिए।

Leave a Comment