चेक बाउंस मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, आंशिक भुगतान के बाद पूरी रकम का चेक पेश करना गलत

चेक बाउंस से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि चेक जारी करने के बाद और उसे बैंक में जमा करने से पहले देनदारी की कुछ रकम चुका दी जाती है, तो पुरानी पूरी रकम का चेक पेश करना कानूनी रूप से महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर सकता है।

अदालत ने माना कि चेक पेश किए जाने के समय वास्तविक रूप से जितनी रकम बकाया थी, उसे ध्यान में रखना जरूरी है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत मिली सजा को रद्द कर दिया।

चेक जारी करने के बाद आंशिक भुगतान हो गया तो पूरी रकम का चेक पेश करना धारा 138 के तहत अपराध नहीं: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि यदि चेक जारी होने के बाद और बैंक में पेश किए जाने से पहले देनदार कुछ रकम चुका देता है, तो कम हो चुकी देनदारी के बावजूद पूरी मूल राशि का चेक बैंक में जमा करना धारा 138 के तहत कार्रवाई का आधार नहीं बन सकता।

न्यायमूर्ति राकेश कैन्थला की पीठ ने इस मामले में निचली अदालत और अपीलीय अदालत द्वारा दी गई सजा को रद्द करते हुए आरोपी को बरी कर दिया। कोर्ट ने माना कि चेक बैंक में प्रस्तुत किए जाने के समय उस पर लिखी पूरी रकम की कानूनी रूप से वसूल योग्य देनदारी मौजूद नहीं रह गई थी।

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क्या था पूरा मामला

यह मामला कुल्लू जिले के मनाली से जुड़ा था। शिकायतकर्ता एक मकान मालिक था और आरोपी उसका किरायेदार था। किराए और अन्य खर्चों से संबंधित देनदारी के लिए आरोपी ने 1,40,000 रुपये का चेक जारी किया था।

शिकायतकर्ता के अनुसार, यह रकम करीब 1,34,600 रुपये के कमरे के किराए तथा बिजली, रखरखाव और मरम्मत जैसे अन्य खर्चों के लिए थी।

चेक 29 अक्टूबर 2018 का था। जब इसे 23 जनवरी 2019 को बैंक में भुगतान के लिए लगाया गया तो खाते में पर्याप्त धनराशि नहीं होने के कारण चेक बाउंस हो गया।

इसके बाद शिकायतकर्ता ने कानूनी नोटिस भेजकर 15 दिनों के भीतर रकम चुकाने की मांग की। भुगतान नहीं होने पर नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज की गई।

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को सुनाई थी सजा

मनाली की न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत ने 30 मई 2023 को आरोपी को धारा 138 के तहत दोषी माना।

अदालत ने उसे छह महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई और 1,84,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। मुआवजा नहीं देने की स्थिति में एक महीने के अतिरिक्त साधारण कारावास का प्रावधान किया गया था।

आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ अपील की, लेकिन 12 दिसंबर 2023 को कुल्लू के सत्र न्यायाधीश ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।

इसके बाद आरोपी ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का रुख किया।

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आरोपी ने हाईकोर्ट में क्या दलील दी

आरोपी की ओर से कहा गया कि चेक को पूरी देनदारी के लिए पेश नहीं किया जा सकता था, क्योंकि चेक जारी होने के बाद शिकायतकर्ता को काफी रकम का भुगतान किया जा चुका था।

मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता की जिरह में ऐसे भुगतानों की जानकारी सामने आई। रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी की ओर से 20 नवंबर 2018 को 1,20,000 रुपये, 29 नवंबर 2018 को 50,000 रुपये और आरोपी की पत्नी के बैंक खाते से 27 जून 2017 को 1,40,000 रुपये का ऑनलाइन भुगतान किए जाने की बात सामने आई।

आरोपी के वकील का कहना था कि चेक जारी होने के बाद हुई रकम की अदायगी ने वास्तविक बकाया राशि को कम कर दिया था। इसलिए शिकायतकर्ता को चेक पर अंकित पूरी राशि के लिए उसे बैंक में पेश नहीं करना चाहिए था।

शिकायतकर्ता की ओर से क्या कहा गया

शिकायतकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि आरोपी ने किराए की देनदारी स्वीकार की थी और चेक जारी करने की बात भी उसके द्वारा स्वीकार की गई थी।

यह भी कहा गया कि हाईकोर्ट पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार में सामान्य अपीलीय अदालत की तरह पूरे साक्ष्य का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकता।

राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कहा कि विवाद निजी पक्षों के बीच था और राज्य की ओर से अलग से कोई विशेष दलील नहीं थी।

हाईकोर्ट ने धारा 138 को लेकर क्या कहा

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल चेक जारी होना और उस पर हस्ताक्षर स्वीकार होना ही पर्याप्त नहीं है। धारा 138 के तहत अपराध के लिए यह भी जरूरी है कि चेक बैंक में पेश किए जाने के समय उसके पीछे कानूनी रूप से वसूल योग्य देनदारी मौजूद हो।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Dashrathbhai Trikambhai Patel v. Hitesh Mahendrabhai Patel (2023) के फैसले का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि यदि चेक जारी करने के बाद लेकिन उसके भुगतान के लिए प्रस्तुत किए जाने से पहले देनदार कुछ या पूरी रकम चुका देता है, तो चेक पर अंकित राशि और वास्तविक बकाया राशि में अंतर पैदा हो जाता है।

ऐसी स्थिति में चेक को पूरी मूल राशि के लिए पेश करना धारा 138 के तहत अपराध की आवश्यक शर्तों को पूरा नहीं करता।

चेक की रकम में हुए भुगतान का असर पड़ेगा

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि चेक जारी होने के बाद उसका कुछ हिस्सा चुका दिया गया है, तो उस भुगतान को चेक से संबंधित रिकॉर्ड में दर्ज किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि आंशिक भुगतान के बाद चेक को शेष देनदारी के अनुरूप ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यदि संशोधित बकाया राशि के लिए चेक पेश किया जाता है और वह फिर भी अनादरित हो जाता है, तो परिस्थितियों के अनुसार धारा 138 लागू हो सकती है।

इस मामले में 50 हजार रुपये का भुगतान अहम रहा

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों पर विशेष ध्यान दिया। कोर्ट ने पाया कि 29 नवंबर 2018 को 50,000 रुपये का भुगतान शिकायतकर्ता के खाते में किया गया था।

यह भुगतान चेक जारी होने की तारीख 29 अक्टूबर 2018 के बाद हुआ था, जबकि चेक को बैंक में 23 जनवरी 2019 को पेश किया गया।

इसका मतलब था कि चेक जारी होने और बैंक में पेश किए जाने के बीच आरोपी की देनदारी कम हो चुकी थी। इसके बावजूद चेक को पूरी 1,40,000 रुपये की रकम के लिए बैंक में पेश किया गया।

शिकायत में भुगतान का उल्लेख नहीं किया गया था

कोर्ट ने यह भी देखा कि शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत में बाद में प्राप्त रकम का उचित खुलासा नहीं किया था।

हाईकोर्ट के अनुसार, चेक की राशि से संबंधित बाद का भुगतान इस मामले में महत्वपूर्ण था, क्योंकि उससे चेक के पीछे मौजूद वास्तविक कानूनी देनदारी कम हो गई थी।

इसलिए केवल यह तथ्य कि आरोपी ने चेक जारी करने या देनदारी स्वीकार करने की बात मानी थी, शिकायतकर्ता के पक्ष में पर्याप्त नहीं था।

निचली अदालतों के फैसले हाईकोर्ट ने रद्द किए

हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालतों ने चेक जारी होने के बाद और उसकी प्रस्तुति से पहले किए गए भुगतान के कानूनी प्रभाव पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।

कोर्ट के अनुसार, जब देनदारी का कुछ हिस्सा पहले ही चुकाया जा चुका था, तब पूरी मूल रकम के लिए चेक पेश नहीं किया जा सकता था।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और सत्र अदालत के फैसलों को रद्द कर दिया। आरोपी को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत लगाए गए आरोप से बरी कर दिया गया

जुर्माने की रकम लौटाने का आदेश

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि आरोपी ने कोई जुर्माना जमा किया है तो अपील की निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद, सुप्रीम कोर्ट के किसी आदेश के अधीन रहते हुए, वह रकम उसे वापस की जाए।

इसके अलावा आरोपी को संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत 50,000 रुपये के निजी बॉन्ड और इतनी ही राशि के एक जमानती के साथ बॉन्ड प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया।

कोर्ट के फैसले का क्या मतलब है

इस फैसले से यह सिद्धांत सामने आता है कि चेक बाउंस के मामले में केवल चेक की मूल राशि देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखा जाएगा कि चेक को बैंक में पेश किए जाने की तारीख पर वास्तव में कितनी कानूनी देनदारी बाकी थी।

यदि चेक जारी करने के बाद और उसकी प्रस्तुति से पहले देनदार ने कुछ रकम चुका दी है, तो उस भुगतान को नजरअंदाज करके पूरी पुरानी राशि का चेक पेश करना धारा 138 के तहत कार्रवाई को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि, किसी विशेष मामले में धारा 138 लागू होती है या नहीं, यह संबंधित तथ्यों, भुगतान के रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करेगा।

मामले की जानकारी

मामला: Chet Ram v. Ranjeet
केस नंबर: Criminal Revision No. 627 of 2024
अदालत: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
पीठ: न्यायमूर्ति राकेश कैन्थला
फैसले की तारीख: 10 सितंबर 2026
मुख्य कानून: Negotiable Instruments Act, 1881 की धारा 138

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