भारत में वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में शामिल करने को लेकर चल रही कानूनी बहस अब एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने है। केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने का फैसला न्यायपालिका के बजाय संसद और सरकार को लेना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर करीब तीन सप्ताह बाद सुनवाई शुरू करने की बात कही है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस दौरान मौजूदा कानूनी व्यवस्था और वैवाहिक बलात्कार से जुड़े अपवाद की संवैधानिक वैधता पर विचार करेगी।
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल क्या हैं?
अदालत ने संकेत दिया है कि इस मामले में दो प्रमुख कानूनी प्रश्नों पर विचार किया जाएगा।
पहला सवाल यह है कि यदि वैवाहिक संबंध में बलात्कार को मौजूदा कानून के तहत अपवाद प्राप्त है, तो क्या इसके बावजूद पति के खिलाफ बलात्कार के आरोप में कार्रवाई की जा सकती है।
दूसरा और बड़ा सवाल यह है कि वैवाहिक बलात्कार को बलात्कार की कानूनी परिभाषा से बाहर रखने वाला अपवाद संविधान के अनुरूप है या नहीं।
इन दोनों सवालों का जवाब इस बात पर प्रभाव डाल सकता है कि भारत में विवाह के भीतर बिना सहमति के यौन संबंधों को भविष्य में किस तरह कानूनी रूप से देखा जाएगा।
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शादी का मतलब व्यक्तिगत स्वायत्तता खत्म होना नहीं
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने इस बात पर जोर दिया कि विवाह किसी महिला की व्यक्तिगत स्वायत्तता को समाप्त नहीं कर सकता।
अदालत के अनुसार, यदि किसी महिला के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाया जाता है, तो वह पीड़ित है। हालांकि, वर्तमान कानून में इसे बलात्कार के अपराध के रूप में किस सीमा तक माना जा सकता है, यह मौजूदा वैधानिक अपवाद की संवैधानिक स्थिति पर निर्भर करेगा।
पीठ ने यह भी संकेत दिया कि यदि वैवाहिक संबंध में महिला को गंभीर चोट या अन्य गंभीर नुकसान पहुंचता है, तो ऐसे मामलों में कानून की दूसरी धाराएं भी लागू हो सकती हैं।
केंद्र सरकार ने क्या कहा?
केंद्र की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एसजी मेहता ने अदालत के सामने कहा कि वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
सरकार का तर्क है कि किसी नए अपराध को कानून के रूप में लागू करने का अधिकार विधायिका और कार्यपालिका के पास है। इसलिए यदि वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करना है, तो इस पर संसद को फैसला करना चाहिए।
केंद्र ने यह भी कहा है कि इस मुद्दे का केवल कानूनी पक्ष नहीं है, बल्कि इसके व्यापक सामाजिक प्रभाव भी हो सकते हैं। सरकार के अनुसार, भारतीय सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर इस विषय पर फैसला लिया जाना चाहिए।
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BNS में वैवाहिक बलात्कार का क्या प्रावधान है?
भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 63 बलात्कार से संबंधित प्रावधान रखती है। इसमें एक वैवाहिक अपवाद भी मौजूद है।
इस अपवाद के तहत 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र की पत्नी के साथ पति द्वारा बनाए गए यौन संबंध को धारा 63 के तहत बलात्कार नहीं माना जाता।
यही अपवाद वर्तमान कानूनी विवाद के केंद्र में है। याचिकाकर्ता इस व्यवस्था को चुनौती देते हुए इसे संवैधानिक अधिकारों के विपरीत बताते हैं।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील क्या है?
याचिकाकर्ताओं का मूल तर्क यह है कि विवाह किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के शरीर पर असीमित अधिकार नहीं देता।
इस दृष्टिकोण के अनुसार, शादी के बाद भी महिला की सहमति का महत्व बना रहता है। इसलिए यदि उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाया जाता है, तो केवल वैवाहिक रिश्ता होने के आधार पर उसे बलात्कार की कानूनी श्रेणी से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता, गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता जैसे संवैधानिक अधिकारों से जुड़े प्रश्न शामिल हैं।
वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाने की मांग कब से चल रही है?
भारत में वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की मांग कई वर्षों से कानूनी बहस का विषय रही है।
इस संबंध में शुरुआती महत्वपूर्ण याचिकाएं वर्ष 2015 में दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल हुई थीं। वर्ष 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट की पीठ इस मुद्दे पर एकमत फैसला नहीं दे सकी और मामले में विभाजित फैसला सामने आया।
इसके बाद यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां अब वैवाहिक बलात्कार से संबंधित कानूनी अपवाद और उसकी संवैधानिक वैधता पर विचार किया जा रहा है।
केंद्र और सुप्रीम कोर्ट के बीच मुख्य अंतर क्या है?
इस मामले में केंद्र और याचिकाकर्ताओं के रुख के बीच सबसे बड़ा अंतर यह है कि वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाने का फैसला कौन करे।
केंद्र का कहना है कि यह मुख्य रूप से कानून बनाने की प्रक्रिया से जुड़ा विषय है और संसद को इस पर निर्णय लेना चाहिए।
वहीं, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि मौजूदा कानूनी प्रावधान संविधान में दिए गए अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो सुप्रीम कोर्ट उसकी संवैधानिक वैधता की समीक्षा कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट अब इसी संवैधानिक प्रश्न की जांच करेगा।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह तीन सप्ताह बाद इस मामले से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई शुरू करेगा।
अदालत को यह तय करना होगा कि वैवाहिक बलात्कार से संबंधित मौजूदा अपवाद संविधान की कसौटी पर टिकता है या नहीं। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि मौजूदा कानून के रहते वैवाहिक संबंध में यौन हिंसा के मामलों में किस तरह की आपराधिक कार्रवाई संभव है।
इस सुनवाई का परिणाम भारत में विवाह, सहमति और महिला की व्यक्तिगत स्वायत्तता से जुड़े कानूनों पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
निष्कर्ष
वैवाहिक बलात्कार का मुद्दा केवल यह तय करने तक सीमित नहीं है कि किसी अपराध की कानूनी परिभाषा क्या होगी। इसके साथ यह सवाल भी जुड़ा है कि विवाह के बाद व्यक्ति की सहमति, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक सुरक्षा किस तरह लागू होती है।
जहां केंद्र सरकार इस विषय पर संसदीय निर्णय की बात कर रहा है, वहीं सुप्रीम कोर्ट अब मौजूदा वैधानिक अपवाद की संवैधानिक वैधता की जांच करने जा रहा है। आने वाली सुनवाई इस लंबे समय से चल रही कानूनी बहस की दिशा तय करने में अहम हो सकती है।