पावर ऑफ अटॉर्नी किसी व्यक्ति को संपत्ति से जुड़े काम करने का अधिकार दे सकती है, लेकिन इससे वह व्यक्ति संपत्ति का मालिक नहीं बन जाता। दिल्ली हाईकोर्ट ने संपत्ति की बिक्री से मिली रकम को लेकर हुए विवाद में इस महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराया।
कोर्ट ने कहा कि मालिक की ओर से संपत्ति बेचने वाला पावर ऑफ अटॉर्नी धारक एक एजेंट की भूमिका में रहता है और वह मालिक के हिस्से की बिक्री राशि को अपने पास नहीं रख सकता। एजेंट का कर्तव्य है कि वह मालिक की ओर से प्राप्त रकम का सही हिसाब दे और उसे संबंधित मालिक को सौंपे।
पावर ऑफ अटॉर्नी से संपत्ति का मालिकाना हक नहीं मिलता, बिक्री की रकम मालिक को देनी होगी: दिल्ली हाईकोर्ट
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने संपत्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल पावर ऑफ अटॉर्नी मिलने से किसी व्यक्ति को संपत्ति का मालिकाना हक हासिल नहीं हो जाता। पावर ऑफ अटॉर्नी धारक को संपत्ति के संबंध में कार्य करने का अधिकार मिल सकता है, लेकिन वह उस संपत्ति का वास्तविक मालिक नहीं बन जाता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि कोई एजेंट या पावर ऑफ अटॉर्नी धारक मालिक की ओर से संपत्ति बेचता है, तो बिक्री से प्राप्त रकम पर उसका व्यक्तिगत अधिकार नहीं होता। उसे मालिक के हिस्से की राशि का पूरा हिसाब देना और रकम संबंधित मालिक को सौंपना जरूरी है।
यह फैसला जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने Bhisham Mehta v. Mrs. Gita Vig & Ors. मामले में सुनाया।
क्या था पूरा विवाद?
मामला नई दिल्ली के नजफगढ़ स्थित पपरावत गांव की करीब 26 बीघा कृषि भूमि से संबंधित था। यह जमीन वर्ष 1985 में चार सह-मालिकों ने खरीदी थी। इनमें कुसुम मेहता की संपत्ति में एक-चौथाई हिस्सेदारी थी।
बाद में भिशम मेहता को संपत्ति के संबंध में रजिस्टर्ड जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी दी गई। इसी अधिकार के आधार पर उन्होंने पूरी जमीन की बिक्री अप्रैल 2011 में Agile Properties Limited के पक्ष में कर दी।
संपत्ति का कुल सौदा लगभग 6.95 करोड़ रुपये में हुआ था। कुसुम मेहता की एक-चौथाई हिस्सेदारी के हिसाब से उन्हें करीब 1.74 करोड़ रुपये मिलने चाहिए थे।
हालांकि, उनके बैंक खाते में लगभग 72 लाख रुपये ही जमा किए गए। बाकी करीब 1.01 करोड़ रुपये की राशि को लेकर विवाद खड़ा हो गया।
कुसुम मेहता ने शेष रकम की मांग की। बाद में वर्ष 2013 में उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उनकी तीन बेटियों ने कानूनी वारिस के तौर पर बकाया राशि की वसूली के लिए मामला आगे बढ़ाया।
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पावर ऑफ अटॉर्नी धारक ने क्या दलील दी?
भिशम मेहता की ओर से यह तर्क दिया गया कि उन्हें पावर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से संपत्ति से जुड़े व्यापक अधिकार मिले थे। उन्होंने यह दावा भी किया कि जमीन की खरीद में वास्तविक आर्थिक योगदान उनके और उनकी पत्नी का था तथा अन्य महिलाओं के नाम सुविधा के लिए शामिल किए गए थे।
उन्होंने यह भी कहा कि कुसुम मेहता को जो करीब 72 लाख रुपये मिले थे, वह जमीन की बिक्री की रकम नहीं बल्कि एक व्यक्तिगत ऋण था।
इसके अलावा, उन्होंने वसूली के मुकदमे को समय-सीमा के आधार पर भी चुनौती दी और कहा कि मामला निर्धारित अवधि के बाद दायर किया गया था।
हाईकोर्ट ने पावर ऑफ अटॉर्नी को लेकर क्या कहा?
दिल्ली हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने बिक्री दस्तावेज की जांच करते हुए पाया कि उसमें चारों महिलाओं को संपत्ति का मालिक और विक्रेता बताया गया था। भिशम मेहता ने दस्तावेज पर उनकी ओर से अधिकृत जनरल अटॉर्नी के रूप में हस्ताक्षर किए थे।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पावर ऑफ अटॉर्नी का मूल उद्देश्य किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की ओर से कार्य करने का अधिकार देना है। इससे संपत्ति का स्वामित्व अपने आप पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के पास नहीं चला जाता।
अदालत ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के Suraj Lamp & Industries Pvt. Ltd. v. State of Haryana फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें पावर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से संपत्ति का मालिकाना हक हस्तांतरित करने के दावे को स्वीकार नहीं किया गया था।
बिक्री से मिली रकम पर एजेंट का अधिकार नहीं
हाईकोर्ट ने भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 218 का भी उल्लेख किया। इस प्रावधान के अनुसार, एजेंट को अपने प्रिंसिपल की ओर से प्राप्त रकम का हिसाब देना होता है और वह राशि प्रिंसिपल को सौंपनी होती है।
इसका मतलब है कि यदि कोई व्यक्ति मालिक की ओर से संपत्ति बेचता है, तो बिक्री से मिलने वाली रकम को अपनी निजी संपत्ति नहीं मान सकता।
इस मामले में भी भिशम मेहता ने मालिकों की ओर से संपत्ति बेची थी। इसलिए कुसुम मेहता के हिस्से की बिक्री राशि उन्हें या उनके कानूनी वारिसों को देना उनका दायित्व था।
72 लाख रुपये को ऋण बताने की दलील नहीं चली
कोर्ट ने उस दलील को भी स्वीकार नहीं किया जिसमें लगभग 72 लाख रुपये को व्यक्तिगत ऋण बताया गया था।
अदालत ने पाया कि इस कथित ऋण को साबित करने के लिए कोई भरोसेमंद दस्तावेज या ऋण समझौता पेश नहीं किया गया था। इसके अलावा, इसी अवधि में अन्य सह-मालिकों के खातों में भी रकम जमा की गई थी।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि कुसुम मेहता ने अपने आयकर रिकॉर्ड में इस रकम को संपत्ति से संबंधित प्राप्ति के रूप में दर्शाया था। इन परिस्थितियों में रकम को अलग से दिए गए व्यक्तिगत ऋण के रूप में पेश करने का दावा विश्वसनीय नहीं माना गया।
मुकदमे में देरी की दलील भी खारिज
भिशम मेहता ने यह भी तर्क दिया कि संपत्ति की बिक्री 2011 में हुई थी, जबकि वसूली का मुकदमा 2014 में दायर किया गया। इसलिए उनका दावा था कि मामला लिमिटेशन की अवधि से बाहर था।
हाईकोर्ट ने इस आपत्ति को भी खारिज कर दिया।
अदालत के अनुसार, मामले में यह महत्वपूर्ण था कि कुसुम मेहता को लेन-देन और बकाया रकम के बारे में जानकारी कब हुई। कोर्ट ने माना कि उन्हें अप्रैल 2012 में इस संबंध में जानकारी मिली थी और इसके बाद अप्रैल 2014 में वसूली की कार्रवाई शुरू की गई।
इसलिए मुकदमा तीन साल की निर्धारित अवधि के भीतर माना गया।
ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार
इससे पहले ट्रायल कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता के Order XII Rule 6 के तहत फैसला देते हुए 1,01,78,074 रुपये की राशि चुकाने का आदेश दिया था। इस रकम पर 11 अप्रैल 2011 से भुगतान होने तक 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी लगाया गया था।
दिल्ली हाईकोर्ट को ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई कानूनी गलती नहीं मिली। इसलिए हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए पहले दिए गए आदेश को बरकरार रखा।
इस फैसले से क्या स्पष्ट होता है?
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए संपत्ति से जुड़े लेन-देन करते हैं।
फैसले का मुख्य संदेश यह है कि पावर ऑफ अटॉर्नी अधिकार देती है, लेकिन अपने आप संपत्ति का मालिकाना हक नहीं देती।
यदि कोई एजेंट मालिक की ओर से संपत्ति बेचता है, तो उसे बिक्री से प्राप्त रकम का सही हिसाब रखना होगा और मालिक के हिस्से की राशि उसे सौंपनी होगी। केवल पावर ऑफ अटॉर्नी का धारक होने के आधार पर वह बिक्री की रकम पर अपना स्वामित्व नहीं जता सकता।
मामले की मुख्य जानकारी
मामला: Bhisham Mehta v. Mrs. Gita Vig & Ors.
केस नंबर: RFA 645/2022
अदालत: दिल्ली हाईकोर्ट
पीठ: जस्टिस नीना बंसल कृष्णा
विवादित राशि: ₹1,01,78,074 और ब्याज
नतीजा: हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।