केरल हाई कोर्ट ने सरोगेसी के लिए निर्धारित उम्र सीमा में छूट देने से इनकार करते हुए एक दंपति की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि पहले से भ्रूण सुरक्षित होने के बावजूद कानून में तय पात्रता शर्तों का पालन जरूरी है।
केरल हाई कोर्ट ने सरोगेसी की उम्र सीमा को माना वैध, दंपति को पात्रता प्रमाणपत्र देने से इनकार
केरल हाई कोर्ट ने सरोगेसी के जरिए बच्चा पाने की इच्छा रखने वाले एक दंपति को बड़ी राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि सरोगेसी कानून में तय की गई उम्र की सीमा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मामले में पति की उम्र निर्धारित अधिकतम सीमा से अधिक हो चुकी थी। इसी आधार पर संबंधित प्राधिकरण ने दंपति को पात्रता प्रमाणपत्र जारी करने से मना कर दिया था। दंपति ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि सरोगेसी की अनुमति के लिए कानून में तय शर्तों का पालन करना जरूरी है। केवल इस आधार पर उम्र की शर्त से छूट नहीं दी जा सकती कि दंपति ने पहले ही प्रजनन उपचार शुरू कर दिया था या भ्रूण तैयार करके सुरक्षित रख लिए थे।
दंपति ने हाई कोर्ट का रुख क्यों किया?
दंपति ने सरोगेसी की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक पात्रता प्रमाणपत्र मांगा था। हालांकि, संबंधित राज्य बोर्ड ने आवेदन स्वीकार नहीं किया क्योंकि पति निर्धारित अधिकतम उम्र पार कर चुके थे।
दंपति का कहना था कि उनका प्रजनन उपचार उस समय शुरू हुआ था जब पति निर्धारित उम्र सीमा के भीतर थे। उनका तर्क था कि बाद में उम्र बढ़ जाने के कारण पहले से शुरू की गई प्रक्रिया को रोकना उचित नहीं होगा।
रिकॉर्ड के अनुसार, दंपति ने वर्ष 2022 में प्रजनन उपचार कराया था और उनके निषेचित भ्रूण 30 अगस्त 2022 को सुरक्षित कर दिए गए थे।
बाद में उन्हें चिकित्सा आधार पर सरोगेसी की जरूरत से संबंधित प्रमाणपत्र भी मिला। इसके बाद दंपति ने आगे की कानूनी प्रक्रिया के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
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पात्रता प्रमाणपत्र क्यों नहीं मिला?
दंपति ने मई 2025 में राज्य के संबंधित Assisted Reproductive Technology और Surrogacy Board के समक्ष पात्रता प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया था।
लेकिन उस समय पति की उम्र कानून में निर्धारित अधिकतम सीमा से अधिक हो चुकी थी। इसी कारण बोर्ड ने आवेदन को मंजूरी नहीं दी।
दंपति ने इसके बाद हाई कोर्ट में याचिका दायर की और उम्र की शर्त को चुनौती दी।
दंपति ने क्या दलील दी?
दंपति की ओर से कहा गया कि जब उन्होंने प्रजनन उपचार शुरू किया था, तब पति उम्र की निर्धारित सीमा के भीतर थे।
उनका तर्क था कि प्रक्रिया के दौरान उम्र बढ़ने को आधार बनाकर उन्हें सरोगेसी से बाहर करना उचित नहीं होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की स्थिति उनके संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी है। दंपति ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत अपने अधिकारों का हवाला देते हुए संबंधित कानूनी प्रावधान पर सवाल उठाया।
उनका यह भी कहना था कि भ्रूण पहले ही तैयार होकर सुरक्षित रखे जा चुके हैं, इसलिए बाद में उम्र की शर्त लागू करना उनके लिए गंभीर कठिनाई पैदा करेगा।
केंद्र सरकार ने क्या कहा?
केंद्र सरकार ने दंपति की दलीलों का विरोध किया।
सरकार की ओर से कहा गया कि पात्रता का फैसला उस समय लागू कानूनी स्थिति के अनुसार किया जाना चाहिए जब पात्रता प्रमाणपत्र जारी किया जा रहा हो।
सरकार ने यह भी बताया कि जब दंपति के भ्रूण तैयार किए गए और सुरक्षित रखे गए थे, तब तक सरोगेसी से संबंधित नया कानून लागू हो चुका था।
इसलिए दंपति को यह दावा करने का आधार नहीं मिल सकता कि उनकी पूरी प्रक्रिया कानून लागू होने से पहले शुरू हो गई थी और उन्हें नई कानूनी शर्तों से छूट मिलनी चाहिए।
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हाई कोर्ट ने उम्र सीमा को क्यों बरकरार रखा?
केरल हाई कोर्ट ने सरोगेसी कानून में निर्धारित उम्र की सीमा को मनमाना नहीं माना।
अदालत ने कहा कि कानून बनाने वाली संस्था अलग-अलग परिस्थितियों के आधार पर उचित वर्गीकरण कर सकती है, बशर्ते उसका कानून के उद्देश्य से तार्किक संबंध हो।
अदालत के अनुसार, सरोगेसी के लिए उम्र की सीमा तय करने का कानून के उद्देश्य से उचित संबंध है। इसलिए इसे केवल इस आधार पर असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता कि किसी व्यक्ति को प्रक्रिया के दौरान उम्र संबंधी समस्या का सामना करना पड़ा।
भ्रूण पहले से सुरक्षित होने का तर्क भी स्वीकार नहीं हुआ
इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि दंपति के निषेचित भ्रूण पहले ही सुरक्षित किए जा चुके थे।
दंपति ने इसी तथ्य के आधार पर राहत की मांग की थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने माना कि भ्रूण का पहले से सुरक्षित होना अपने आप में कानून की पात्रता शर्तों से छूट का अधिकार नहीं देता।
अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि भ्रूण अगस्त 2022 में सुरक्षित किए गए थे और उस समय तक सरोगेसी से संबंधित कानून लागू हो चुका था।
इसलिए दंपति को पुराने कानूनी नियमों के आधार पर सरोगेसी प्रक्रिया जारी रखने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।
सरोगेसी कानून और ART कानून अलग हैं
दंपति ने Assisted Reproductive Technology से जुड़े कानून के प्रावधानों का भी सहारा लिया था।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरोगेसी और Assisted Reproductive Technology से जुड़े दोनों कानूनों के उद्देश्य और कानूनी ढांचे को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि एक कानून के प्रावधानों को दूसरे कानून में उसी तरीके से लागू नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब दोनों कानून अलग-अलग उद्देश्यों को पूरा करने के लिए बनाए गए हों।
हाई कोर्ट ने याचिका खारिज की
सभी दलीलों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद केरल हाई कोर्ट ने दंपति को पात्रता प्रमाणपत्र देने का निर्देश देने से इनकार कर दिया।
अदालत ने सरोगेसी कानून में निर्धारित उम्र की शर्त को बरकरार रखा और दंपति की चुनौती को स्वीकार नहीं किया।
इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि सरोगेसी की प्रक्रिया शुरू कर देना या भ्रूण को सुरक्षित कर लेना अपने आप में कानूनी पात्रता की गारंटी नहीं है। संबंधित व्यक्ति को कानून में निर्धारित सभी शर्तों को पूरा करना होगा।
इस फैसले का क्या महत्व है?
यह फैसला उन दंपतियों के लिए महत्वपूर्ण है जो भारत में सरोगेसी के जरिए बच्चा पाने की योजना बना रहे हैं।
निर्णय यह संकेत देता है कि सरोगेसी प्रक्रिया शुरू करने से पहले उम्र समेत सभी कानूनी पात्रता शर्तों की जांच करना जरूरी है।
यदि प्रक्रिया के किसी चरण में आवश्यक पात्रता पूरी नहीं होती है, तो केवल पहले किए गए मेडिकल उपचार या सुरक्षित रखे गए भ्रूण के आधार पर कानूनी छूट मिलना जरूरी नहीं है।
इसलिए सरोगेसी की योजना बना रहे लोगों के लिए मेडिकल प्रक्रिया के साथ-साथ लागू कानून और आवश्यक प्रमाणपत्रों की स्थिति को पहले से समझना महत्वपूर्ण है।