सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों की स्वच्छता याचिका को विशेष पीठ के पास भेजा

सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में छात्राओं की स्वच्छता से जुड़ी याचिका उसी पीठ को भेजी जिसने मासिक धर्म संबंधी अधिकार तय किए थे

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी स्कूलों में छात्राओं के लिए पर्याप्त और कार्यशील शौचालयों की कमी से जुड़ी जनहित याचिका को उस पीठ के समक्ष भेजने का निर्देश दिया है, जिसने हाल ही में मासिक धर्म स्वच्छता को संवैधानिक अधिकारों से जोड़ते हुए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए थे। कोर्ट ने मामले को गंभीर और व्यापक महत्व का विषय माना है।

क्या है मामला?

यह जनहित याचिका रीपक कंसल की ओर से केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के खिलाफ दायर की गई है। इसमें सरकारी स्कूलों में छात्राओं के लिए पर्याप्त स्वच्छता सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने का मुद्दा उठाया गया है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने नीति आयोग की रिपोर्ट के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि देशभर में 98,000 से अधिक स्कूलों में छात्राओं के लिए कार्यशील शौचालय उपलब्ध नहीं हैं। यह स्थिति विशेष रूप से लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और गरिमा को प्रभावित कर सकती है।

किस पीठ के पास भेजा गया मामला?

सोमवार को इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने की।

पीठ ने कहा कि इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही विस्तृत फैसला दे चुका है। इसलिए वर्तमान याचिका को न्यायमूर्ति जे.बी. पार्डीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता के वकील को पहले के फैसले और उसमें जारी दिशा-निर्देशों का अध्ययन करने की सलाह दी। वकील ने भी कहा कि वह पुराने आदेशों को देखने के बाद तय करेंगे कि वर्तमान याचिका को आगे जारी रखना है या नहीं।

पहले के फैसले में क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने?

सुप्रीम कोर्ट ने 30 जनवरी को दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले में मासिक धर्म से जुड़ी स्वच्छता सुविधाओं को महिलाओं और छात्राओं की गरिमा तथा स्वास्थ्य से जुड़े संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में देखा था।

न्यायमूर्ति जे.बी. पार्डीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा था कि सुरक्षित, प्रभावी और किफायती menstrual hygiene products तक पहुंच व्यक्ति के सम्मानजनक जीवन से जुड़ी है। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से जोड़ा था।

कोर्ट ने यह भी माना था कि लड़कियों के लिए ऐसा स्कूल वातावरण जरूरी है जिसमें वे मासिक धर्म के दौरान भी सम्मान और सुरक्षा के साथ अपनी पढ़ाई जारी रख सकें। यह अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा के अधिकार को प्रभावी बनाने के लिए भी आवश्यक है।

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स्कूलों के लिए पहले ही जारी किए जा चुके हैं कई निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले फैसले में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्कूलों की स्वच्छता व्यवस्था सुधारने के लिए कई निर्देश दिए थे।

इन निर्देशों के तहत सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों में छात्र-छात्राओं के लिए उचित और अलग-अलग शौचालयों की व्यवस्था पर जोर दिया गया था। शौचालयों में पर्याप्त पानी और हाथ धोने के लिए साबुन जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध होनी चाहिए।

इसके अलावा स्कूलों की स्वच्छता सुविधाएं इस तरह तैयार और संचालित करने का निर्देश दिया गया था कि छात्राओं की गोपनीयता और गरिमा बनी रहे। दिव्यांग बच्चों की जरूरतों को भी ध्यान में रखने की बात कही गई थी।

सैनिटरी नैपकिन और Menstrual Hygiene Management की व्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट ने छात्राओं की मासिक धर्म संबंधी जरूरतों को देखते हुए स्कूलों में मुफ्त ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने और menstrual hygiene management corners स्थापित करने के निर्देश भी दिए थे।

इन स्थानों पर जरूरत के समय इस्तेमाल होने वाली आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने की व्यवस्था करने को कहा गया था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मासिक धर्म के कारण छात्राओं की पढ़ाई बाधित न हो।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

स्कूलों में शौचालय और मासिक धर्म स्वच्छता की सुविधाएं केवल बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर का विषय नहीं हैं। इनका सीधा संबंध छात्राओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा, सम्मान और शिक्षा से है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका को पहले इस मुद्दे पर फैसला देने वाली पीठ के पास भेजना यह दर्शाता है कि अदालत मामले को पहले से तय संवैधानिक सिद्धांतों और दिशा-निर्देशों के संदर्भ में देखना चाहती है।

आगे की सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि पहले जारी किए गए निर्देशों को स्कूलों में किस तरह लागू किया जा रहा है और जहां अभी भी कमियां हैं, उन्हें दूर करने के लिए क्या अतिरिक्त कदम आवश्यक हैं।

स्रोत: सुप्रीम कोर्ट से संबंधित रिपोर्ट, 17 अगस्त 2026।

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