दिल्ली की एक अदालत ने यूट्यूबर अजीत भारती को SC/ST एक्ट से जुड़े मामले में बड़ा झटका देते हुए उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने प्रारंभिक स्तर पर माना कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(r) के तहत अपराध का प्रथम दृष्टया मामला बनता है।
SC/ST एक्ट मामले में यूट्यूबर अजीत भारती को अग्रिम जमानत से इनकार
अदालत के अनुसार, जब SC/ST एक्ट के तहत प्रथम दृष्टया अपराध सामने आता है, तो इस कानून में मौजूद विशेष प्रावधान अग्रिम जमानत देने पर रोक लगाते हैं।
यह आदेश 7 सितंबर 2026 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ प्रताप सिंह ललर ने State of Delhi v. Ajeet Bharti मामले में पारित किया।
अजीत भारती के खिलाफ मामला क्यों दर्ज हुआ?
यह मामला अजीत भारती द्वारा अपने YouTube चैनल और सोशल मीडिया अकाउंट पर प्रकाशित एक वीडियो से जुड़ा है।
शिकायत के अनुसार, 22 अगस्त 2026 को प्रसारित किए गए कार्यक्रम में नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद और डॉ. भीमराव आंबेडकर से संबंधित कथित आपत्तिजनक एवं जातिसूचक टिप्पणियां की गई थीं।
शिकायत में कुछ अन्य टिप्पणियों को भी आपत्तिजनक, अपमानजनक और धमकी से जुड़ा बताया गया।
इसके बाद दिल्ली के नॉर्थ एवेन्यू पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया। FIR में SC/ST एक्ट के अलावा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की कुछ धाराएं भी लगाई गईं।
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वीडियो में क्या कहा गया था?
अदालत ने उस वीडियो के उन हिस्सों पर ध्यान दिया जिनके आधार पर शिकायत दर्ज की गई थी।
मामले की शुरुआत कथित तौर पर सोशल मीडिया पर एक यूजर की टिप्पणी से हुई थी। उस टिप्पणी में अजीत भारती की बहन की शादी चंद्रशेखर आजाद से कराने की बात कही गई थी और इसे आरक्षण के मुद्दे से जोड़ा गया था।
इसके जवाब में भारती ने शादी, जाति और सामाजिक स्थिति से संबंधित टिप्पणियां कीं।
अदालत के अनुसार, बातचीत के दौरान ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया गया जिसमें जाति को लेकर कथित तौर पर श्रेष्ठता और हीनता का संकेत दिखाई देता था।
अदालत ने वीडियो में मौजूद कुछ अश्लील प्रकृति की टिप्पणियों को अपने आदेश में विस्तार से दोहराने से भी परहेज किया।
अजीत भारती की ओर से अदालत में क्या दलील दी गई?
अजीत भारती के वकील ने अदालत में कहा कि SC/ST एक्ट के तहत अपराध के जरूरी तत्व प्रथम दृष्टया भी पूरे नहीं होते।
बचाव पक्ष की ओर से यह तर्क दिया गया कि शिकायतकर्ता ने स्वयं कथित घटना नहीं देखी थी और कथित टिप्पणी सीधे शिकायतकर्ता के सामने नहीं की गई थी।
वकील ने यह भी दलील दी कि SC/ST एक्ट की संबंधित धाराओं के लिए अपमान या धमकी का सार्वजनिक रूप से दिखाई देना आवश्यक है। बचाव पक्ष के अनुसार, इंटरनेट पर उपलब्ध किसी वीडियो को केवल इस आधार पर “सार्वजनिक दृष्टि” में हुई घटना नहीं माना जा सकता।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि वीडियो में कही गई बातें एक सोशल मीडिया यूजर की काल्पनिक टिप्पणी के जवाब में थीं और उनका उद्देश्य किसी विशेष महिला या व्यक्ति को जाति के आधार पर अपमानित करना नहीं था।
अजीत भारती की ओर से सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों का भी हवाला दिया गया, जिनमें Hitesh Verma v. State of Uttarakhand और Shajan Skaria v. State of Kerala शामिल थे।
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दिल्ली कोर्ट ने SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) पर क्या कहा?
अदालत ने स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत के चरण में वह आरोपी की अंतिम दोषसिद्धि या निर्दोषता का फैसला नहीं कर रही थी।
इस स्तर पर अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या उपलब्ध सामग्री के आधार पर SC/ST एक्ट के तहत प्रथम दृष्टया अपराध दिखाई देता है।
धारा 3(1)(r) केवल इसलिए लागू नहीं हो जाती क्योंकि किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति के बारे में कोई अपमानजनक बात कही गई हो। कथित अपमान का संबंध उस व्यक्ति की जाति से होना भी जरूरी है।
अदालत ने वर्तमान मामले में माना कि कथित टिप्पणियों में जाति का संदर्भ महज संयोग से नहीं आया था। अदालत के अनुसार, बातचीत में जाति और विवाह को जोड़कर की गई टिप्पणियां मामले के लिए महत्वपूर्ण थीं।
अदालत ने जाति संबंधी टिप्पणियों को क्यों महत्वपूर्ण माना?
अदालत ने बचाव पक्ष द्वारा पेश किए गए Shajan Skaria फैसले से वर्तमान मामले को अलग माना।
न्यायालय के अनुसार, उस पुराने मामले में ऐसी स्पष्ट जातिसूचक टिप्पणी नहीं थी जिससे SC/ST एक्ट के तहत अपराध का प्रथम दृष्टया आधार बन सके।
वर्तमान मामले में अदालत ने पाया कि कथित टिप्पणियों में जाति को बातचीत के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में इस्तेमाल किया गया था।
विशेष रूप से किसी व्यक्ति को ऊंची जाति के परिवार की महिला से विवाह करने के लिए “योग्य” होने जैसी कथित टिप्पणी को अदालत ने महत्वपूर्ण माना।
अदालत के प्रारंभिक मत के अनुसार, ऐसी भाषा को जातिगत सामाजिक पदानुक्रम और कथित जातिगत श्रेष्ठता के संदर्भ में देखा जा सकता है।
ऑनलाइन वीडियो और “सार्वजनिक दृष्टि” का सवाल
इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दा यह भी था कि इंटरनेट पर प्रसारित वीडियो SC/ST एक्ट में इस्तेमाल किए गए “सार्वजनिक दृष्टि” के मानदंड को पूरा करता है या नहीं।
अदालत ने इस सवाल पर अंतिम फैसला नहीं दिया।
हालांकि, आदेश में यह उल्लेख किया गया कि वीडियो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध था और शिकायत के समय तक उसे हजारों बार देखा जा चुका था।
इस कारण अदालत ने अग्रिम जमानत के स्तर पर यह मानने से इनकार किया कि सार्वजनिक दृष्टि से जुड़ी शर्त स्पष्ट रूप से पूरी नहीं होती।
इस कानूनी सवाल पर अंतिम निर्णय मामले की आगे की कार्यवाही में किया जा सकता है।
SC/ST एक्ट के कारण अग्रिम जमानत में क्या बाधा आई?
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु SC/ST एक्ट की धारा 18 है।
अदालत ने प्रारंभिक रूप से धारा 3(1)(r) के तहत अपराध बनता हुआ माना। इसके बाद SC/ST एक्ट में मौजूद धारा 18 के कारण अग्रिम जमानत देने पर कानूनी रोक लागू हो गई।
यही कारण रहा कि अदालत ने अजीत भारती को गिरफ्तारी से पहले जमानत देने से इनकार कर दिया।
अदालत ने यह भी माना कि जब विशेष कानून के तहत अग्रिम जमानत पर रोक लागू हो जाती है, तब सामान्य जमानत संबंधी पहलुओं पर विस्तार से विचार करना आवश्यक नहीं रह जाता।
IT Act और BNS की धाराओं पर अदालत का रुख
बचाव पक्ष ने यह तर्क भी दिया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता के तहत लगाए गए आरोप अलग प्रकृति के हैं। इसलिए SC/ST एक्ट की वजह से उन अपराधों में भी अग्रिम जमानत पर रोक नहीं लगनी चाहिए।
अदालत ने इस स्तर पर इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
न्यायालय ने माना कि सभी आरोप एक ही वीडियो और कथित घटनाक्रम से जुड़े हुए हैं। इसलिए इस स्तर पर अलग-अलग अपराधों को अलग घटना मानकर अग्रिम जमानत देने का आधार नहीं बनता।
अदालत ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज की
सभी प्रारंभिक तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद दिल्ली की अदालत ने अजीत भारती की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि उसके सामने इस चरण में केवल अग्रिम जमानत से संबंधित सवाल था। अदालत ने अजीत भारती को दोषी घोषित नहीं किया है।
मामले में अंतिम फैसला आगे होने वाली न्यायिक प्रक्रिया और साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद ही किया जाएगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत पर दिए गए उसके प्रारंभिक अवलोकनों का इस्तेमाल ट्रायल के दौरान मामले के अंतिम निर्णय को प्रभावित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
इस फैसले का मुख्य महत्व क्या है?
इस आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने केवल यह देखा कि क्या SC/ST एक्ट के तहत प्रथम दृष्टया अपराध दिखाई देता है।
अदालत ने माना कि कथित टिप्पणियों में जाति का संदर्भ महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और इसलिए धारा 3(1)(r) के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है।
एक बार ऐसा निष्कर्ष सामने आने के बाद SC/ST एक्ट की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर रोक लागू हो गई।
यह मामला सोशल मीडिया और ऑनलाइन वीडियो में जातिसूचक टिप्पणियों से जुड़े कानूनी सवालों को भी सामने लाता है। विशेष रूप से यह सवाल महत्वपूर्ण है कि इंटरनेट पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री SC/ST एक्ट के “सार्वजनिक दृष्टि” संबंधी प्रावधान को किस परिस्थिति में पूरा करती है।
फिलहाल अदालत ने इस व्यापक कानूनी प्रश्न पर अंतिम राय नहीं दी है।