मद्रास हाई कोर्ट ने DNA टेस्ट और बिगैमी से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे की पितृत्व को लेकर सवाल उठना अपने आप में दूसरी शादी या बिगैमी के आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत के अनुसार, DNA जांच तभी प्रासंगिक हो सकती है जब उसका सीधा संबंध मामले के मुख्य कानूनी विवाद से हो।
इस फैसले ने पितृत्व विवाद और दूसरी शादी के आरोप के बीच कानूनी अंतर को एक बार फिर स्पष्ट किया है।
मद्रास HC: बच्चे के DNA टेस्ट से अकेले बिगैमी साबित नहीं होगी
मद्रास हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल बच्चे के जैविक पिता का पता लगाने के लिए DNA टेस्ट का आदेश नहीं दिया जा सकता, खासकर तब जब बच्चे की पितृत्व का सवाल बहुविवाह यानी बिगैमी के आरोप से सीधे जुड़ा हुआ न हो।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी आपराधिक मामले में मुख्य सवाल यह है कि आरोपी ने पहली शादी के रहते दूसरी शादी की या नहीं, तो बच्चे का जैविक पिता कौन है, यह अपने आप में उस अपराध को साबित नहीं करता।
क्या था मामला?
मामला एक वैवाहिक विवाद से जुड़ा था। एक व्यक्ति ने जनवरी 2011 में एक महिला से शादी की थी। जून 2012 में महिला ने एक बच्चे को जन्म दिया।
बाद में महिला ने आरोप लगाया कि उसके पति ने अपनी पहले से मौजूद शादी की जानकारी छिपाकर उसके साथ विवाह किया था। इस आधार पर उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू हुई।
मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी ने बच्चे की पितृत्व पर सवाल उठाया। इसके बाद बच्चे, महिला और आरोपी का DNA परीक्षण कराने की मांग की गई।
ट्रायल कोर्ट ने DNA टेस्ट की अनुमति दे दी। इसके खिलाफ आरोपी ने मद्रास हाई कोर्ट का रुख किया।
Also Read: चौथे बच्चे के लिए Maternity Leave पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला
हाई कोर्ट ने DNA टेस्ट पर क्या कहा?
जस्टिस मोहम्मद शफीक ने मामले की सुनवाई करते हुए यह देखा कि प्रस्तावित DNA टेस्ट का परिणाम कथित अपराध को साबित करने में वास्तव में कितना उपयोगी होगा।
अदालत ने पाया कि बच्चे का जैविक पिता कौन है, इसका पता लगाना कथित बिगैमी को सीधे साबित नहीं करता।
बिगैमी के आरोप में मुख्य सवाल यह होता है कि क्या आरोपी की पहली शादी के रहते दूसरी वैध शादी हुई थी। इसलिए बच्चे की पितृत्व जांच को इस अपराध के आवश्यक तत्व से जोड़ना उचित नहीं था।
पितृत्व और दूसरी शादी दो अलग-अलग मुद्दे
हाई कोर्ट ने इस मामले में दोनों सवालों के बीच अंतर स्पष्ट किया।
बच्चे का जैविक पिता कौन है और क्या आरोपी ने दूसरी शादी की थी, ये दो अलग कानूनी प्रश्न हैं।
मान लीजिए DNA जांच से यह साबित भी हो जाए कि आरोपी बच्चे का जैविक पिता है। इससे अपने आप यह साबित नहीं होगा कि आरोपी ने दूसरी शादी की थी।
इसी तरह, DNA रिपोर्ट किसी कथित विवाह के कानूनी रूप से संपन्न होने का प्रमाण नहीं बन सकती।
DNA टेस्ट कब जरूरी हो सकता है?
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि DNA टेस्ट को हर पितृत्व विवाद में नियमित रूप से इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
ऐसी जांच किसी व्यक्ति की निजता और व्यक्तिगत अधिकारों से जुड़ा संवेदनशील विषय है। इसलिए अदालत को यह देखना जरूरी है कि जांच की वास्तव में कोई ठोस और महत्वपूर्ण आवश्यकता है या नहीं।
यदि DNA टेस्ट से मिलने वाली जानकारी मामले के मुख्य कानूनी प्रश्न का समाधान नहीं करती, तो केवल किसी सहायक या गौण मुद्दे के लिए ऐसी जांच का आदेश देना उचित नहीं होगा।
बिगैमी के मामले में क्या साबित करना जरूरी है?
बिगैमी से जुड़े आपराधिक मामले में अभियोजन पक्ष को उन तथ्यों और परिस्थितियों को साबित करना होता है जो कथित दूसरी शादी से संबंधित हैं।
सिर्फ बच्चे का जन्म या उसकी जैविक पितृत्व यह साबित नहीं करती कि आरोपी ने दूसरी शादी की थी।
इसलिए अदालत का ध्यान उस तथ्य पर होना चाहिए जो वास्तव में आरोप के आवश्यक तत्वों को स्थापित करता है।
फैसले का क्या महत्व है?
मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि DNA टेस्ट को किसी आपराधिक मामले में सिर्फ इसलिए नहीं कराया जा सकता क्योंकि किसी पक्ष ने बच्चे की पितृत्व पर सवाल उठा दिया है।
यदि पितृत्व का मुद्दा मुख्य अपराध से केवल अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है और उससे कथित दूसरी शादी साबित नहीं होती, तो DNA जांच का आदेश देने का पर्याप्त आधार नहीं बनता।
इस फैसले से यह महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है कि DNA जांच तभी कराई जानी चाहिए जब उसका परिणाम मामले में तय किए जाने वाले मुख्य विवाद से वास्तविक और सीधा संबंध रखता हो।
आसान भाषा में समझें
मद्रास हाई कोर्ट का संदेश साफ है—अगर किसी व्यक्ति पर पहली शादी के रहते दूसरी शादी करने का आरोप है, तो यह साबित करने के लिए बच्चे का DNA टेस्ट कराना जरूरी नहीं है कि वह व्यक्ति बिगैमी का दोषी है।
बच्चे की पितृत्व और दूसरी शादी का कानूनी अस्तित्व अलग-अलग प्रश्न हैं। इसलिए केवल पितृत्व विवाद को आधार बनाकर DNA टेस्ट का आदेश नहीं दिया जा सकता।