सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जजों के टैक्स पर दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश, PAN और ITR की जानकारी देने का निर्देश

दिल्ली हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के उन जजों के आयकर रिटर्न को लेकर महत्वपूर्ण अंतरिम निर्देश जारी किया है, जिन्होंने नई आयकर व्यवस्था (New Tax Regime) के तहत अपना ITR दाखिल किया है। मामला उन भत्तों और सुविधाओं के टैक्स ट्रीटमेंट से जुड़ा है, जो न्यायाधीशों को उनके पद के कारण कानून के तहत मिलते हैं।

कोर्ट ने निर्देश दिया है कि संबंधित जजों के निजी सचिव उनके PAN, असेसमेंट ईयर, ITR दाखिल करने की तारीख और रिटर्न का acknowledgment number आयकर विभाग को उपलब्ध कराएं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मामले पर अंतिम फैसला आने तक संबंधित रिटर्न पर सामान्य प्रक्रिया के तहत कार्रवाई न हो।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन की याचिका से जुड़ा है। एसोसिएशन ने सितंबर 2025 में CBDT की ओर से जारी कार्यालय ज्ञापन को चुनौती दी है। इस ज्ञापन के बाद नई कर व्यवस्था अपनाने वाले सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को मिलने वाली कुछ सुविधाओं और भत्तों के टैक्स उपचार पर सवाल खड़ा हुआ।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि न्यायाधीशों को मिलने वाले कुछ लाभ संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के तहत निर्धारित हैं। इसलिए केवल एक प्रशासनिक आदेश के माध्यम से इन वैधानिक लाभों को आयकर के दायरे में नहीं लाया जा सकता।

किन सुविधाओं पर है टैक्स विवाद?

मामले में मुख्य रूप से न्यायाधीशों को मिलने वाली कुछ सुविधाओं और भत्तों का मुद्दा उठाया गया है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

  • सरकारी या किराया-मुक्त आवास
  • वाहन एवं आवागमन से जुड़ी सुविधाएं
  • Sumptuary Allowance यानी आतिथ्य/आधिकारिक खर्च से संबंधित भत्ता
  • Leave Travel Concession (LTC)
  • अन्य वैधानिक सुविधाएं

पारंपरिक टैक्स व्यवस्था में इन लाभों को संबंधित न्यायिक सेवा कानूनों के तहत विशेष कर उपचार प्राप्त था। विवाद यह है कि नई टैक्स व्यवस्था चुनने पर क्या इन लाभों को भी कर योग्य आय में शामिल किया जा सकता है?

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हाईकोर्ट जजों और सुप्रीम कोर्ट जजों के लिए अलग कानून

न्यायाधीशों की सेवा शर्तों से संबंधित प्रावधान अलग-अलग कानूनों में मौजूद हैं। हाईकोर्ट के जजों के लिए High Court Judges (Salaries and Conditions of Service) Act, 1954 और सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए Supreme Court Judges (Salaries and Conditions of Service) Act, 1958 लागू होते हैं।

याचिकाकर्ता पक्ष का तर्क है कि इन कानूनों में जिन लाभों को विशेष रूप से निर्धारित किया गया है, उनका स्वरूप केवल सामान्य आयकर छूट जैसा नहीं है। इसलिए नई कर व्यवस्था में उपलब्ध सामान्य deductions या exemptions को सीमित करने वाले प्रावधानों के आधार पर इन वैधानिक लाभों को स्वतः कर योग्य नहीं माना जाना चाहिए।

आयकर विभाग के सामने क्या परेशानी आई?

दिल्ली हाईकोर्ट के पहले अंतरिम आदेश के बाद आयकर विभाग ने अदालत का रुख किया। विभाग ने बताया कि ITR की processing एक केंद्रीकृत और काफी हद तक स्वचालित प्रणाली के जरिए होती है।

इस प्रणाली में किसी विशेष रिटर्न को केवल इसलिए अलग से रोकना आसान नहीं है कि वह किसी मौजूदा सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट जज का है। विभाग के अनुसार, अगर पूरे सिस्टम को पुराने निर्देश के अनुसार रोका जाए तो इसका असर बड़ी संख्या में अन्य करदाताओं के रिटर्न पर भी पड़ सकता है।

इसी व्यावहारिक समस्या को देखते हुए अदालत ने व्यवस्था में बदलाव करते हुए संबंधित जजों की पहचान संबंधी जानकारी आयकर विभाग को उपलब्ध कराने का रास्ता अपनाया।

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18 अगस्त तक देनी होगी जानकारी

जिन जजों ने 22 जुलाई के अंतरिम आदेश के आधार पर नई कर व्यवस्था में अपना ITR दाखिल किया है, उनके निजी सचिवों को निर्धारित जानकारी आयकर विभाग के अधिकारी को 18 अगस्त 2026 तक उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है।

यदि कोई जज आगे चलकर इसी आदेश के आधार पर नया या revised ITR दाखिल करता है, तो उसके निजी सचिव को निर्धारित जानकारी रिटर्न दाखिल होने के 12 घंटे के भीतर विभाग को देने की व्यवस्था की गई है।

क्या जजों का ITR अभी प्रोसेस होगा?

कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जिन संबंधित जजों की जानकारी आयकर विभाग को मिल जाती है, उनके रिटर्न की processing फिलहाल नहीं की जाएगी।

यदि किसी ऐसे रिटर्न की processing पहले ही हो चुकी है और उसके आधार पर टैक्स डिमांड बनी है, तो उस मांग पर फिलहाल कार्रवाई नहीं की जाएगी। इसी तरह अगर किसी जज को refund मिलना है, तो उसे भी मामले के अंतिम निर्णय तक जारी नहीं किया जाएगा।

पहले से जारी किया जा चुका refund भी इस याचिका के अंतिम परिणाम के अधीन रहेगा।

नई टैक्स व्यवस्था को लेकर क्या है विभाग का पक्ष?

आयकर विभाग की ओर से तर्क दिया गया कि नई कर व्यवस्था में अपेक्षाकृत कम टैक्स दरों और बदले हुए tax slabs का लाभ पहले से उपलब्ध है। विभाग का कहना है कि यदि दूसरी व्यवस्थाओं के तहत मिलने वाले अतिरिक्त लाभ भी साथ में जारी रखे जाएं तो एक ही आय पर दोहरी कर राहत जैसी स्थिति बन सकती है।

विभाग ने विशेष रूप से Income Tax Act की Section 115BAC का हवाला दिया है, जिसके तहत नई कर व्यवस्था में कई पारंपरिक exemptions और deductions उपलब्ध नहीं होते।

याचिकाकर्ताओं का क्या कहना है?

दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन का मुख्य तर्क है कि न्यायाधीशों के कुछ लाभ सीधे संसद द्वारा बनाए गए कानूनों से प्राप्त होते हैं। इसलिए किसी executive memorandum के जरिए इन वैधानिक अधिकारों की प्रकृति को बदला नहीं जा सकता।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और न्यायाधीशों की सेवा शर्तों पर प्रशासनिक निर्देशों के जरिए ऐसा प्रभाव नहीं डाला जाना चाहिए, जिससे उनके वैधानिक अधिकार प्रभावित हों।

22 जुलाई के आदेश में क्या कहा गया था?

इस विवाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने इससे पहले 22 जुलाई 2026 को अंतरिम आदेश दिया था। उस आदेश में नई कर व्यवस्था चुनने वाले जजों को संबंधित न्यायिक भत्तों को ऐसी प्राप्तियों के रूप में दिखाने की अनुमति दी गई थी, जिन्हें taxable income का हिस्सा नहीं माना जा रहा था।

साथ ही, आयकर विभाग को ऐसे रिटर्न की processing रोकने का निर्देश दिया गया था। वर्तमान आदेश मुख्य रूप से उस निर्देश को लागू करने के व्यावहारिक तरीके से संबंधित है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी उठा था मामला

इसी तरह का टैक्स विवाद इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी सामने आया है। जुलाई में जस्टिस संदीप जैन ने इस मुद्दे से संबंधित याचिका दाखिल की थी।

याचिका में बताया गया कि वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान उनके कुल वेतन में लगभग ₹46.78 लाख शामिल थे, जिसमें करीब ₹9.85 लाख भत्तों से संबंधित थे। इसमें लगभग ₹2.81 लाख Sumptuary Allowance और ₹7.04 लाख House Rent Allowance शामिल था।

नई कर व्यवस्था के तहत इन राशियों के टैक्स उपचार को लेकर विवाद पैदा हुआ। 28 जुलाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट की पीठ ने अलग से अंतरिम राहत देने से इनकार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के पहले से लागू आदेश को ध्यान में रखा।

अब आगे क्या होगा?

दिल्ली हाईकोर्ट का वर्तमान आदेश अंतिम फैसला नहीं है। अदालत अभी यह तय करेगी कि नई कर व्यवस्था में न्यायाधीशों को कानून के तहत मिलने वाले संबंधित भत्तों और सुविधाओं को किस तरह कर के लिए देखा जाना चाहिए।

मामले की अगली सुनवाई 3 सितंबर 2026 को निर्धारित की गई है। इसलिए फिलहाल इन भत्तों की अंतिम कर स्थिति पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकला है।

निष्कर्ष

दिल्ली हाईकोर्ट के इस आदेश का केंद्र बिंदु केवल ITR processing रोकना नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि नई टैक्स व्यवस्था और न्यायाधीशों की सेवा से जुड़े विशेष वैधानिक प्रावधानों के बीच किसे प्राथमिकता मिलेगी

अदालत के अंतिम फैसले से यह स्पष्ट होगा कि संसद द्वारा निर्धारित न्यायिक भत्तों और नई आयकर व्यवस्था के प्रावधानों का आपसी संबंध किस तरह समझा जाएगा। फिलहाल संबंधित जजों के रिटर्न, टैक्स डिमांड और refunds को अंतिम निर्णय तक अंतरिम सुरक्षा दी गई है।

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